Home spritualismओशो ने बताया राम और कृष्ण में भेद ।। प्रेम ही परमातमा है -ओशो

ओशो ने बताया राम और कृष्ण में भेद ।। प्रेम ही परमातमा है -ओशो

ओशो ने बताया राम और कृष्ण में भेद ।। प्रेम ही परमातमा है -ओशो

मेरे पास बहुत मित्र पत्र लिख कर भेज देते हैं कि आप कृष्ण पर बोले, बुद्ध पर बोले, जीसस पर बोले, कबीर, नानक, पर बोले !! राम को क्यों छोड़ जाते हैं? तुलसी की रामायण को क्यों छोड़ जाते हैं? तुलसीदास पर क्यों नहीं बोलते? राम पर क्यों नहीं बोलते?


कारण है। सज्जन में मेरी बहुत रुचि नहीं है। संत में मेरी रुचि है। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। मर्यादा के जो पार है,उसमें मेरी रुचि है। कृष्ण में मेरी रुचि है, क्योंकि कृष्ण मर्यादा—शून्य हैं। कृष्ण से ज्यादा चरित्रहीन व्यक्ति पाओगे संसार में! कृष्ण से ज्यादा गैर— भरोसे योग्य व्यक्ति पाओगे कहीं! किसी बात का पक्का नहीं है।

छोटे बच्चे जैसा व्यवहार है। कसम खा ली थी कि शस्त्र न उठाऊंगा, फिर उठा लिया! कसमों का कोई हिसाब रखे! किसको याद रहे कसम! छोटे बच्चे जैसा व्यवहार है!
मुझसे लोग पूछते हैं कि कृष्ण के इस व्यवहार में आप क्या देखते हैं? कुछ भी नहीं देखता हूं —यह सीधा—सरल व्यवहार है। खा ली थी कसम किसी क्षण में; अब वह क्षण गया, नया क्षण आ गया। अब इस नये क्षण की नई स्थिति है। इस नये क्षण का नया संवेग है! इस नये क्षण के लिए नया उत्तर चाहिए! पुरानी कसम से बंधे रहते तो मर्यादा होती। बंधे न रहे। अस्तित्व के नये ढंग के साथ नये हो लिए।

तुमने कृष्ण का एक नाम सुना रणछोड़दास जी! भगोड़ादास जी! भाग खड़े हुए! किसी मौके पर देखा कि भागने में ही सार है तो फिर ऐसा नहीं कि जिद की तरह अड़े रहेंगे कि चाहे जान रहे कि जाये, झंडा ऊंचा रहे हमारा! भाग गये, कि देखा कि परिस्थिति भागने की है, तो इसमें अकड़ न रखी। उनके भक्तों ने भी खूब नाम बना लिया—रणछोड़दास जी!

कृष्ण में एक मर्यादा—पार की प्रभा है। कृष्ण को समझना थोड़ा कठिन है। राम सीधे —साफ हैं। राम में कुछ विशिष्ट नहीं। महिमापूर्ण हैं, मगर विशिष्ट नहीं। महात्मा हैं, लेकिन संत नहीं। इसलिए जान कर छोड़ता रहा हूं। जब परम की ही बात करनी हो तो राम वहां नहीं आते। और इसी की सूचना हिंदुओं ने भी दी। उन्होंने भी राम को अंशावतार कहा;पूर्णावतार कहने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि बात गलत हो जायेगी। कृष्ण को पूर्णावतार कहा।

कहा कि यह पूरा—पूरा परमात्मा। पूरा—पूरा परमात्मा का अर्थ हुआ : अब मर्यादा भी नहीं। मर्यादा भी आदमी की होती है। सीमा आदमी की होती है। तो ठीक है राम के लिए मर्यादापुरुषोत्तम नाम, कि पुरुषों में उत्तम मर्यादा वाले, सबसे बड़ी मर्यादा वाले ।।

कृष्ण बड़े और ढंग के हैं। कोई मर्यादा नहीं है। मर्यादा मात्र शून्य है। इसलिए कृष्ण को पूर्णावतार कहा है; परमात्मा जैसे पूरा—पूरा उतरा! परमात्मा संत में पूरा—पूरा उतरता है, महात्मा में बंधा—बंधा उतरता है। और दुर्जन में तो पड़ गया गड्डे में, कीचड—कबाड़ में। जैसे शराबी पड़ा होता है नाली में, ऐसा दुर्जन में परमात्मा नाली में पड़ जाता है, सज्जन में खड़ा हो जाता है, संत में उड़ने लगता है। संत की ही बात मैंने की है अब तक—इस आशा में कि जहां जाना है, जो होना है, उसकी ही बात करनी उचित है; बीच के पड़ावों की क्या बात करनी!

राम एक सराय हैं, मंजिल नहीं। रुक जाना रात भर, अगर कृष्ण समझ में न आते हों तो राम पर रुक जाना, बिलकुल ठीक है। बाहर पड़े रहने की बजाय खुले आकाश के नीचे, धर्मशाला में ठहर जाना, लेकिन धर्मशाला मंजिल नहीं है। इसलिए तुलसी का मेरे मन में कोई बहुत मूल्य नहीं है। स्थिति—स्थापक हैं।

कबीर की बात और! कबीर क्रांति हैं! तुलसी—परंपरा। पिटा—पिटाया है। कुछ नया नहीं। कोई मौलिक नहीं। कोई क्रांति का स्वर नहीं है। क्रांति के स्वर सुनने हों तो कबीर में सुनो या नानक में सुनो या फरीद में या अष्टावक्र में सुनो। अष्टावक्र तो महास्रोत हैं क्रांति के। जगत में जितने भी आध्यात्मिक क्रांतिकारी हुए, सब की मूल सूचनायें अष्टावक्र में मिल जायेंगी। अष्टावक्र जैसे मूल स्रोत हैं, हिमालय हैं, जहां से सारी क्रांति की गंगाऐ बही है ।।

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